मंगळवार, १३ मार्च, २००७

अन्योक्ती - कृष्णशास्त्री चिपळूणकर

सूर्यान्योक्ति

(शार्दूलविक्रीडित)

देखूनी उदया तुझ्या द्विजकुळे गाती अती हर्षुनी,
शार्दूलादिक सर्व दुष्ट दडती गिर्यंतरीं जाउनी,
देशी ताप परी जसा वरिवरी येशी नभीं, भास्करा,
अत्त्युच्चीं पदिं थोरही बिधडतो हा बोल आहे खरा.

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गजान्योक्ति

(स्त्रग्धरा)

ज्याची स्पर्धा कराया इतर गज कधीं शक्त नाहीच झाले
सांगावे काय? ज्याच्या मृगपतिहि भयें रान सोडून गेले,
तो पंकामाजिं आजी गजवर फसला, युक्ति नाहीं निघाया.
अव्हेरिती, पहा, हे कलकल करुनी क्षुद्र कोल्हे तयाला.

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हरिणान्योक्ति

(शार्दूलविक्रीडित)

जाळे तोडुनियां बळें हरिण तो टाळोनि दावाग्निला,
व्याधाचे चुकवूनि बाणहि महावेगें पुढें चालिला,
तों घाईंत उडी फसूनि पडला आडामधें बापडा;
होती सर्वहि यत्न निष्फळ, जरी होई विधी वांकडा.

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आंब्याविषयी

(शार्दूलविक्रीडित)

ज्याचे पल्लव मंगलप्रद, शिणा छाया जयाची हरी
गंधें युक्ते फुलें, फळेंही असती ज्याचीं सुधेच्या परी,
वाटे जो रमणीय भूषण वनश्रीचे मुखींचें, भला
आम्रा त्या पिक सेवितां समसमां संयोग कीं जाहला!

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बगळ्याविषयी

(शिखरिणी)

उभा राहे एके चरणिं धरणीतें धरुनियां
तपश्चर्या वाटे करित जणुं डोळे मिटुनियां,
बका ऐशा ढोंगे तव अमति मासेच ठकती,
परि ज्ञाते तूझें कपट लवलाहीं उमजती.

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चंदनाविषयी

(पृथ्वी)

वनीं विलसती बहू विविध वृक्ष चोंहींकडे,
तयांत मज चंदनासम न एकही सांपडे,
जयास न दिली फळें न कुसुमेंहि दैवें जरी,
शरीर झिजवूनि जो तरि परोपकारा करी.

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कोकिलान्योक्ती

येथे समस्त बहिरे बसतात लोक
का मधुर भाषणे तू करिशी अनेक
हे मूर्ख, यांस नसे किमपी विवेक
रंगावरुन तुजला गमतील काक

1 टिप्पणी:

Prashant Uday Manohar म्हणाले...

छान संग्रह केला आहे तुम्ही. एक दुरुस्ती सुचवावीशी वाटते.
कोकिलान्योक्ती : दुसरी ओळ खालीलप्रमाणे आहे.

"का भाषणे मधुर तू करिशी अनेक"

धन्यवाद.